जीवन के मौसम अनजाने से, पर रिश्ता इनसे गहरा है !!
ना कहा-सुनी इससे करना, यह तो बचपन से बहरा है !!
कभी आग लगे, कभी धुआं उठे,
कभी बारिश जमकर टूट पड़े !
हर वक़्त कहीं कुछ घटता है,किस रस्ते हम मजबूर खड़े !
क्यों सारा जग इठलाता है,
जब स्तर नभ की ओर बड़े !
कब किस क्षण कैसी विपदा हो,
राजा या रंक ना फर्क पड़े !
जीवन के मौसम अनजाने से, पर रिश्ता इनसे गहरा है !!
ना कहा-सुनी इससे करना, यह तो बचपन से बहरा है !!
कभी बिजली बन टूटे सर पर, कभी रोशन घर बन दीप करे !
कभी दो रोटी मिलना मुश्किल, कभी छप्पन भोग के स्वाद चखे !
छाया जिस पर पड़ जाये वह, साडे साती की भेंट चढ़े!
कभी तेल में भजिया तलते थे, अब लेकर शीशी द्वार खड़े !!
जीवन के मौसम अनजाने से, पर रिश्ता इनसे गहरा है !!
ना कहा-सुनी इससे करना, यह तो बचपन से बहरा है !!
नादान बड़ा वह बचपन था, हँस, बोल, सभी से खेल लिए !
स्वार्थ, कपट और लालच को, है यौवन अपने साथ लिए !
जब ह्रदय गति रुक जाएगी, है जाना सबकुछ छोड़ यहाँ !
बंधन जोड़ा जिन फूलों ने, जीवन का करें वह अंत बयाँ !
जीवन के मौसम अनजाने से, पर रिश्ता इनसे गहरा है !!
ना कहा-सुनी इससे करना, यह तो बचपन से बहरा है !!
आपका शिवा
बर्लिन, जर्मनी
२३- अप्रेल-२०१२

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