क्यों हो इतनी गुम-सुम गोरी, कि जा बैठी तुम छत के ऊपर !
नज़र फिरा और देख ले दुनिया, खुशी दिखेगी खुद बेघर !!
तुमने क्या, इतना बहुत सहा , कि सहन नहीं हो रहा समय !
क्यों नीचे कूदे जाती हो , क्या मौत का तुझको नहीं है भय !!
जा जाकर अपने "अपनों " को, जी भर के देख ज़रा फिर से !
फिर डर एक तुझमे जागेगा , जीने की इच्छा प्रबल जगे !!
गर मोह ने अपनी माया में , जो बाँध लिया तुझको कसके !!
फिर देखें तुझमे कितना दम, जो मार सके खुद को खुद से !!!!!!!!
नज़र फिरा और देख ले दुनिया, खुशी दिखेगी खुद बेघर !!
तुमने क्या, इतना बहुत सहा , कि सहन नहीं हो रहा समय !
क्यों नीचे कूदे जाती हो , क्या मौत का तुझको नहीं है भय !!
जा जाकर अपने "अपनों " को, जी भर के देख ज़रा फिर से !
फिर डर एक तुझमे जागेगा , जीने की इच्छा प्रबल जगे !!
गर मोह ने अपनी माया में , जो बाँध लिया तुझको कसके !!
फिर देखें तुझमे कितना दम, जो मार सके खुद को खुद से !!!!!!!!