पिता को समर्पित :-
अनेक अवसरों पर "माँ" के लिए मनोभावों को "मेरी पंक्तियाँ" में व्यक्त किया| आज संकोच छोड़कर, भावनाओ को सशक्त कर कुछ शब्द "पिता" के लिए समर्पित करता हूँ ..
सिर पर हाँथ पिता का होता है, तो बलवान बड़ा मन होता है !
हर सोच मैं उनकी हम ही हैं, संतान ही सब कुछ होता है !
हासिल हो ज़माने की खुशियाँ, निस्वार्थ मनोरथ होता है !!
कटुता भी अगर मुह में है तो, वह दिल बड़ा निर्मल होता है !
हर मार में उनकी, शिक्षा है, सच्चा अपनापन होता है !!
परमेश्वर से, पहले तुम हो , अस्तित्व का तुम ही हो आधार !
आत्मा की अमर चेतना से, करता हूँ नमन में बारम्बार !!
आपका शिवा
२४ - मई - २०११
अनेक अवसरों पर "माँ" के लिए मनोभावों को "मेरी पंक्तियाँ" में व्यक्त किया| आज संकोच छोड़कर, भावनाओ को सशक्त कर कुछ शब्द "पिता" के लिए समर्पित करता हूँ ..
सिर पर हाँथ पिता का होता है, तो बलवान बड़ा मन होता है !
निश्चिन्त, फ़िक्र का नाम नहीं, हर पल यही आलम होता है !!
हर सोच मैं उनकी हम ही हैं, संतान ही सब कुछ होता है !
हासिल हो ज़माने की खुशियाँ, निस्वार्थ मनोरथ होता है !!
कटुता भी अगर मुह में है तो, वह दिल बड़ा निर्मल होता है !
हर मार में उनकी, शिक्षा है, सच्चा अपनापन होता है !!
ऊँगली को पकड़ चलना सीखा, संस्कार विरासत में पाये !
सच्चा, समर्थ, शिक्षित बनकर, हर दिशा में परचम लहराए !!
परमेश्वर से, पहले तुम हो , अस्तित्व का तुम ही हो आधार !
आत्मा की अमर चेतना से, करता हूँ नमन में बारम्बार !!
आपका शिवा
२४ - मई - २०११
